चौखंडी स्तूप: सारनाथ की ऐतिहासिक विरासत का एक शानदार प्रमाण

सारनाथ का नाम लेते ही लोगों के दिमाग में बुद्ध से जुड़ी ढेर सारी यादें, शिक्षाएँ और ऐतिहासिक घटनाएँ घूमने लगती हैं। इसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक माहौल के बीच खड़ा है चौखंडी स्तूप, जो सिर्फ एक पुरानी इमारत नहीं है, बल्कि बौद्ध धर्म के शुरुआती अध्यायों को अपने भीतर समेटे हुए एक बेहद महत्वपूर्ण स्मारक है। यह जगह बौद्धों के लिए पवित्र इसलिए भी मानी जाती है क्योंकि यहाँ बुद्ध के जीवन से जुड़ी घटनाओं की सीधी झलक मिलती है। और हाँ, जो लोग इतिहास में दिलचस्पी रखते हैं, उनके लिए यह जगह साफ बता देती है कि भारत की प्राचीन वास्तुकला और कला कितनी गहरी और असरदार थी।

कहा जाता है कि इस स्तूप की शुरुआत सम्राट अशोक के दौर में हुई थी। अशोक जहाँ-जहाँ बुद्ध से जुड़ी घटनाएँ हुई थीं, वहाँ स्तूप बनवाते थे और चौखंडी उनका ही ऐसा एक प्रोजेक्ट माना जाता है जिसे समय के साथ बदला, संवारा और कई बार पुनर्निर्मित किया गया। यही कारण है कि आज यह स्तूप अपने वर्तमान रूप में वैसा नहीं है जैसा कि यह मूल रूप से था।

Chaukhandi stupa sarnath

पहली झलक: दूर से ही एहसास हो जाता है कि यहाँ कुछ खास है

जब आप सारनाथ के मुख्य क्षेत्र की तरफ बढ़ते हैं, तो बाकी स्मारकों के बीच सबसे पहले जो चीज़ आपकी नज़र पकड़ती है, वह है चौखंडी स्तूप की विशाल और अनोखी बनावट। इसका ऊपरी बुर्ज और अष्टभुजीय संरचना दूर से ही आपको यह महसूस करा देती है कि यह कोई साधारण स्मारक नहीं है। ईंट और रोड़ी से बनी इसकी संरचना इस बात का सबूत है कि उस समय की तकनीक और निर्माण क्षमता कितनी मजबूत थी।

अष्टकोण आकार की यह ऊँची संरचना देखते ही यह समझ आ जाता है कि इसका उद्देश्य सिर्फ किसी घटना को यादगार बनाना नहीं था बल्कि इसे एक विशिष्ट महत्व देने के लिए बनाया गया था। ऊपर की ओर बढ़ती रचना, किनारों पर समान भार का संतुलन, और आसपास फैला शांत वातावरण—ये सब मिलकर इस जगह को पर्यटकों के लिए और भी आकर्षक बनाते हैं।

चौखंडी स्तूप का शुरुआती स्वरूप: मंदिर जैसा ढांचा

कई इतिहासकारों का मानना है कि चौखंडी स्तूप का प्रारंभिक स्वरूप किसी मंदिर जैसा था। इसमें ऊपर की ओर जाती सीढ़ियाँ थीं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लोग इसके शीर्ष तक पहुँचकर विशेष पूजा या अनुष्ठान किया करते होंगे। यह साधारण स्तूप जैसा नहीं था, बल्कि एक ऐसा स्मारक था जिसे किसी खास वजह से ऊँचा बनाया गया था।

एक और दिलचस्प बात इसके मूल उद्देश्य से जुड़ी है। कहा जाता है कि गौतम बुद्ध जब सारनाथ पहुँचे थे, तो उन्होंने अपने पहले शिष्य से इसी जगह के पास मुलाकात की थी। यह घटना इतनी महत्वपूर्ण मानी गई कि बाद में इसी स्थान पर मंदिर-सदृश स्तूप का निर्माण कराया गया। यानी यह महज एक स्मारक नहीं, बल्कि बौद्ध धर्म के प्रसार की शुरुआती कड़ी का प्रतीक है।

1589 ई. का उल्लेख: टोडरमल का संबंध और फारसी शिलालेख की उलझन

अगर आप इस स्तूप की गहराई से खोज करेंगे तो आपको एक और रोचक तथ्य मिलेगा। 1589 ई. में टोडरमल के पुत्र गोवर्द्धन ने इसका पुनर्निर्माण कराया था। इसका उल्लेख आपको फारसी भाषा में लिखे एक शिलालेख में मिलता है, जो उत्तरी प्रवेश द्वार पर मौजूद एक पत्थर पर खुदा हुआ है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उसी शिलालेख में हुमायूँ का भी ज़िक्र मिलता है। लिखा हुआ है कि हुमायूँ ने यहाँ एक रात बिताई थी और उन्हें यह जगह इतनी पसंद आई कि उन्होंने इस बुर्ज के निर्माण का आदेश दिया था।

सीधी बात यह है कि दोनों बातों को मिलाकर देखो तो यह साफ है कि इतिहास खुद थोड़ा गड़बड़ा गया है—या तो दोनों बातों में कुछ न कुछ सच है, या फिर स्तूप कई बार पुनर्निर्माण की प्रक्रिया से गुज़रा है और हर शासक ने अपने हिसाब से इसे संशोधित कराया।

खुदाई की कहानी: 1836 और 1905 की दो बड़ी खुदाइयाँ

चौखंडी स्तूप के बारे में बात करते समय इसके अंदर की खुदाइयों का ज़िक्र ज़रूर करना चाहिए। 1836 में एलेक्जेंडर कनिंघम ने यहाँ खुदाई कराई थी। उद्देश्य था किसी समाधि चिह्न या बौद्ध अवशेष को खोज पाना। लेकिन साफ शब्दों में कहें तो यह कोशिश बेकार गई—उन्हें खास कुछ नहीं मिला।

लगभग 60 साल बाद, 1905 में ओरटेल ने यहाँ फिर से खुदाई कराई। इस बार स्थिति थोड़ी बेहतर रही। उन्हें चार गज ऊँचा चबूतरा मिला, अष्टकोणीय आधार का स्पष्ट स्वरूप सामने आया और साथ ही कुछ प्राचीन मूर्तियाँ भी प्राप्त हुईं। इन खोजों ने इस स्तूप के वास्तविक ऐतिहासिक स्वरूप को बेहतर तरीके से समझने का आधार दिया।

आज का चौखंडी स्तूप: बदल चुका है, लेकिन अपनी अहमियत नहीं खोई।

आप अगर सोच रहे हैं कि आज जो स्तूप दिखता है, वही हमेशा से ऐसा था—तो भूल जाओ। यह कई पुनर्निर्माण और बदलावों से गुज़र चुका है। इसका ऊपरी हिस्सा बाद में जोड़ा गया है और इसकी संरचना को कई बार मजबूत किया गया है ताकि यह आधुनिक समय तक टिक सके। फिर भी, इसका महत्व बिल्कुल भी कम नहीं हुआ है। यह स्तूप आज भी उन शुरुआती क्षणों का प्रतीक है जिनसे बौद्ध धर्म का अध्याय शुरू हुआ था। चाहे आप आस्थावान हों या इतिहास के विद्यार्थी, यह स्मारक आपको अपने समय से जोड़ने में सक्षम है।

सारनाथ आने पर सिर्फ चौखंडी स्तूप तक मत रुको

अगर तुम यहाँ आने का प्लान बना रहे हो, तो खुद को सिर्फ चौखंडी स्तूप तक सीमित मत रखना। यहाँ धमेख स्तूप, अशोक स्तंभ, 5वीं शताब्दी की मूर्तिकला, बुद्ध और उनके पाँच शिष्यों को दर्शाती शिक्षण कला, और कोसेत्सु नोसु द्वारा बनाई गई शानदार कलाकृतियाँ भी हैं। इन सब चीज़ों को देखकर तुम साफ समझ जाओगे कि सारनाथ सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक धरोहर का मजबूत आधार है।

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