काशी विश्वनाथ मंदिर: बनारस की धड़कन और महादेव का नित्य धाम

काशी की बात हो और काशी विश्वनाथ मंदिर का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। बनारस की पहचान सिर्फ गंगा घाट या पान-लस्सी से नहीं है, उसकी असली नब्ज़ इस मंदिर से चलती है। यहां रहने वालों के लिए यह सिर्फ कोई पवित्र स्थल नहीं है, बल्कि जीवन का हिस्सा है, एक भाव है, एक ऐसा अनुभव जो शब्दों से ज्यादा महसूस करने वाली चीज़ है। बनारस की तंग गलियों में घूमते वक्त, चाहे दिन हो या रात, कानों में “हर-हर महादेव’’ की गूंज खुद-ब-खुद घुस जाती है। ये आवाज़ सिर्फ नारा नहीं, एक ऊर्जा है, जो इस शहर को ज़िंदा रखती है।

Kashi Vishwanath temple

काशी विश्वनाथ मंदिर गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित है। ये वही जगह है जहां हर रोज़ हजारों श्रद्धालु, देश–विदेश से आने वाले यात्री, साधु–महात्मा और यहां के स्थानीय लोग शिव की एक झलक पाने पहुंच जाते हैं। इस मंदिर का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं कि यहां शिव का ज्योतिर्लिंग है, बल्कि इसलिए भी कि यह भारत के बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक है—और यह ज्योतिर्लिंग विश्व के आध्यात्मिक मानचित्र पर काशी की पहचान को और मजबूत करता है। 

‘विश्वनाथ’ नाम का अर्थ है—‘ब्रह्मांड के शासक’। ये नाम अपने आप में बताता है कि यह स्थान किस स्तर की आध्यात्मिक शक्ति को समेटे हुए है। महाभारत और उपनिषद जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख मौजूद होने से साफ है कि यह मंदिर कोई सामान्य संरचना नहीं, बल्कि सैकड़ों–हजारों सालों से चली आ रही सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का केंद्र है।

लेकिन सच बोलें तो इस मंदिर का इतिहास जितना महान है, उतना ही संघर्षों से भरा भी रहा है। 11वीं से 15वीं शताब्दी के बीच इसका इतिहास कई बार उजड़ा, कई बार फिर से खड़ा हुआ। यहां तक कि इसका नाम सुनकर ही पता चलता है कि इसे बनाने वालों में जितनी भक्ति थी, उतना ही जुनून था इसे हर बार फिर से खड़ा करने का, चाहे जो भी हो जाए।

1194 में मोहम्मद गौरी ने पहली बार इस मंदिर को तुड़वाया। इससे पहले और बाद में भी कई शासकों ने इसे नुकसान पहुंचाया, लेकिन फिर भी इसे बनाने की इच्छा बार-बार उभरती रही। सम्राट विक्रमादित्य और राजा हरीशचंद्र द्वारा की गई मरम्मत शायद पहली कोशिशें थीं जिसने इस मंदिर को फिर से जीवित रखा। लेकिन असली खेल तो इसके बाद शुरू हुआ।

गौरी के हमले के बाद मंदिर को फिर बनाया गया, लेकिन 1447 में सुल्तान मोहम्मद शाह ने फिर से इसे ढहा दिया। हर बार जब मंदिर गिराया जाता था, किसी न किसी भक्त, किसी राजा या पंडित में इतनी शक्ति और आस्था होती थी कि वो इसे फिर से खड़ा कर देते थे। 1585 में पंडित नारायण भट्ट ने राजा टोडरमल की सहायता से मंदिर को फिर से खड़ा किया। ये वही टोडरमल हैं जिन्हें लोग अकबर के नवरत्नों में गिनते हैं और असल में बनारस की संस्कृति के बड़े योगदानकर्ताओं में से एक मानते हैं।

मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 1632 में शाहजहां ने अपनी सेना से करीब 63 छोटे–बड़े मंदिरों को ध्वस्त करवा दिया, लेकिन लोगों के विरोध और जिद के कारण वे मंदिर के मुख्य गर्भगृह को नहीं गिरा पाए। इससे साफ समझ आता है कि काशी के लोगों के लिए यह मंदिर सिर्फ ईंट–गारे की इमारत नहीं, बल्कि आत्मा की तरह था—जिसे कोई मिटा नहीं सकता था।

कहते हैं कि 11वीं से 15वीं शताब्दी के बीच का इतिहास काफी धुंधला है, और बहुत सी घटनाएं किताबों में साफ दर्ज नहीं हैं। लेकिन जो भी दास्तानें मिलती हैं, वे मंदिर पर हुए जुल्म और उसके पुनर्निर्माण के पीछे की अटूट शक्ति को दर्शाती हैं। हर बार मंदिर गिरता था, हर बार शहर उठ खड़ा होता था—मानो खुद महादेव अपनी नगरी की रक्षा कर रहे हों।

इस लगातार संघर्ष की कहानी का सुखद अंत तब आया जब मराठा साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1777 से 1780 के बीच वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया। अगर वह कदम न उठाया जाता, तो शायद आज हम जिस स्वरूप में मंदिर को देखते हैं, वह कभी अस्तित्व में ही न आता।

अहिल्याबाई होल्कर सिर्फ मंदिर को दोबारा खड़ा करके नहीं रुक गईं। उनकी दूरदर्शिता और भक्ति के कारण यह मंदिर आज भी मजबूती से खड़ा है। और इसके बाद पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखर पर सोने का छत्र चढ़ाया। यह सोने का छत्र आज भी इस मंदिर की पहचान है और इसकी चमक काशी के आसमान में महादेव की महिमा की तरह फैली रहती है।

इसके अलावा, नेपाल के महाराज ने यहां विशाल नंदी की मूर्ति स्थापित करवाई। नंदी की यह प्रतिमा गर्भगृह के सामने विराजमान है और सीधे शिवलिंग की ओर देखती है—मानो हर भक्त की प्रार्थना को खुद महादेव तक पहुंचाने की भूमिका निभाती हो।

आज काशी विश्वनाथ मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उन सदियों की कहानी है जिसमें डर था, हमला था, प्रतिरोध था, और फिर पुनर्जन्म था। यह मंदिर बताता है कि कोई भी आस्था जब जनशक्ति बन जाती है, तो उसे मिटाना नामुमकिन होता है।

यही कारण है कि हर दिन, हर घंटे, हर मौसम में यहां श्रद्धालुओं की कतार कभी खत्म नहीं होती। यहां हर कोई आता है—कोई मनोकामना लेकर, कोई कृतज्ञता लेकर, कोई सिर्फ यह महसूस करने कि आखिर काशी को काशी क्या बनाता है।

और शायद यही वजह है कि जब कोई बनारस आता है, तो पहले गंगा और फिर विश्वनाथ—यह दो चीज़ें उसके मन में बस स्वतः उतर जाती हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर सिर्फ इतिहास नहीं, एक जीती-जागती विरासत है, और बनारस के हर कोने में महादेव की महिमा इसी मंदिर से होकर बहती है।

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