गंगा किनारे की दुनिया अपने-आप में एक अलग ब्रह्मांड है। वाराणसी में जितने घाट हैं, उतनी ही कहानियाँ हवा में तैरती रहती हैं। हर घाट की अपनी अलग पहचान है—कहीं आस्था, कहीं वास्तुकला, कहीं अध्यात्म, कहीं इतिहास। लेकिन कुछ जगहें ऐसी भी होती हैं, जिनकी चमक लोगों की नज़रों से बची रहती है, फिर भी वे अपने अंदर सदियों का गर्व छुपाए खड़ी रहती हैं।
इन्हीं जगहों में से एक है राजघाट के पास स्थित लाल खान का मकबरा, जिसे कई लोग दूर से देखते हुए भी पहचान नहीं पाते। लेकिन जो भी यहाँ पहुँचता है, उसे साफ महसूस होता है कि यह कोई साधारण ढांचा नहीं है, बल्कि काशी के इतिहास की एक ऐसी परत है जिसे समझने में वक्त लगता है।

गंगा घाट और लाल खान के मकबरे की अनदेखी खूबसूरती
गंगा किनारे घूमते हुए जब हवा में घुली नमी, लकड़ियों की हल्की महक, और दूर-दूर तक फैली आरती की आवाजें कानों में पड़ती हैं, तो महसूस होता है कि वाराणसी सिर्फ एक शहर नहीं—यह एक भाव है। इस माहौल में लाल खान का मकबरा बिल्कुल अलग तरह की शांति बिखेरता है। अट्ठासी घाटों की भीड़भाड़ और चहल-पहल से निकलकर जब आप यहाँ पहुँचते हो, तो अचानक एक शांत, विस्तृत मैदान सामने खुल जाता है, जहाँ समय जैसे धीरे चलने लगता है।
यह मकबरा लगभग सन् 1773 में बनवाया गया था और वाराणसी से करीब 6 किलोमीटर दूर है। इसकी बनावट, इसकी बारीकियों, और इसकी लोकेशन में एक ऐसी भव्यता दिखती है जो इसे बाकी स्मारकों से अलग करती है। सबसे खास बात—यह पूरा परिसर सिर्फ लाल खान की मजार नहीं है, बल्कि उनके परिवार के कई सदस्यों की कब्रें भी इसी जगह पर बनी हुई हैं।
वास्तुकला जो अपनी उम्र से मुकाबला करते हुए आज भी खड़ी है। इस जगह की वास्तुकला आपको किसी किताब में लिखी इतिहास की लाइन नहीं, बल्कि एक जीवंत झलक दिखाती है। ऊँचे मेहराब, चौड़ी दीवारें, पत्थरों पर की गई नक्काशी—सब कुछ कुछ ऐसा कहता है कि उस दौर में साधारण चीजें भी कितनी मेहनत और सौंदर्यबोध के साथ बनाई जाती थीं।
मकबरे के चारों ओर फैला खुला मैदान इसे और भी राजसी बनाता है। यहाँ खड़े होकर जब आप गंगा की लहरें देखते हैं, घाटों को देखते हैं और साथ में राजघाट पुल का नज़ारा भी मिलता है, तो लगता है कि यह जगह लोकेशन के हिसाब से बिल्कुल Perfect स्पॉट चुनी गई थी। सदियों पुराना यह ढांचा आज भी अपनी जड़ों पर मजबूती से खड़ा है, और शायद यही इसकी असली खूबसूरती है—समय बीत गया, लेकिन इसकी पहचान नहीं बदली।
कौन थे लाल खान? काशी की इतिहास में उनका असली दर्जा
अधिकांश लोग सिर्फ नाम सुनकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन लाल खान कोई आम व्यक्ति नहीं थे। वे काशी नरेश के सेनापति थे—और उस दौर में सेनापति का मतलब सिर्फ सेना संभालने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि राज्य की सुरक्षा, रणनीति और विस्तार का मुख्य स्तंभ। लाल खान अपनी बहादुरी और रणनीति के लिए जाने जाते थे। काशी के विस्तार और उसकी सुरक्षा में उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण था कि काशी नरेश भी उनकी वीरता की तारीफ करते नहीं थकते थे।
इतनी सम्मानित स्थिति होने के कारण जब लाल खान की उम्र अंतिम पड़ाव पर पहुँची, तो काशी नरेश ने खुद उनसे पूछा कि उनकी आखिरी इच्छा क्या है। इसपर उन्होंने जो जवाब दिया, वह आज भी इस मकबरे को खास बनाता है— उन्होंने कहा कि वे राजघाट में दफन होना चाहते हैं, ताकि मरने के बाद भी वे अपने महल की चौखट को दूर से देख सकें। यह सुनकर काशी नरेश ने उनकी इच्छा सिर्फ मानी नहीं, बल्कि उसे पूरा सम्मान भी दिया। आज जो मकबरा आप देखते हैं, वह उसी सम्मान की निशानी है।
‘चौहट्टा लाल खां’—एक नाम, एक मोहल्ला, एक पहचान
दिलचस्प बात यह है कि लाल खान का मकबरा सिर्फ एक स्मारक नहीं, बल्कि एक पूरा मोहल्ला है जिसे लोग “चौहट्टा लाल खां” के नाम से जानते हैं। यह इलाका करीब 5 किलोमीटर में फैला हुआ है और समय के साथ यह जगह कई वजहों से मशहूर होती चली गई। कई फिल्मों की शूटिंग यहाँ हुई है, और कई सेलिब्रिटी इस मोहल्ले में आ चुके हैं। यह जगह अपनी शांति, खुलेपन और पुराने जमाने की वास्तुकला के कारण डायरेक्टर्स की पसंदीदा लोकेशन बन चुकी है।
आमिर खान का कनेक्शन—एक कम चर्चा में रहने वाली दिलचस्प बात
वाराणसी की गलियों में कहानियाँ जल्दी फैलती हैं, लेकिन हर कहानी हर किसी तक नहीं पहुँचती। आपको ये जानकर शायद थोड़ी हैरानी हो कि बॉलीवुड एक्टर आमिर खान का ननिहाल भी इसी इलाके में है। उनकी मां का मायका इसी मोहल्ले में था, और यही वजह है कि कभी-कभी उनका परिवार यहाँ आता-जाता रहा है। यानी यह जगह सिर्फ इतिहास या वास्तुकला के कारण नहीं, बल्कि cultural connection की वजह से भी अपनी पहचान रखती है।
लाल खान का मकबरा—एक अनदेखा पर्यटन स्थल जो असल में hidden gem है।
सच्चाई यही है कि वाराणसी में इतने बड़े-बड़े मंदिर, घाट और प्रसिद्ध लोकेशन हैं कि बहुत सारे लोग इस मकबरे को अपनी लिस्ट में शामिल ही नहीं करते। लेकिन जो भी यहाँ जाता है, उसे एहसास होता है कि यह जगह एक तरह का hidden gem है— न भीड़, न भागदौड़, न ऊँची आवाजें। बस शांति, हवा का हल्का बहाव, और पुरानी दीवारों का सौंदर्य।
यहाँ खड़े होकर लगता है कि शहर की सारी आपाधापी से एकदम अलग दुनिया खुल जाती है। फोटोग्राफर्स के लिए तो यह जगह jackpot है— वाइड एंगल shots, वास्तुकला, गंगा का बैकड्रॉप, और शाम की सुनहरी रोशनी में मकबरे का बदलता रंग… सब कुछ cinematic लगता है।